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शिवसेना ने सामना संपादकीय के जरिए बीजीपी को घेरा

शिवसेना ने सामना संपादकीय के जरिए बीजीपी को घेरा

5 राज्यो के चुनाव में बीजीपी के परफॉर्मेंस को लेकर बताया किस तरह की है बीजीपी की राजनीति

बीजीपी के चुनावी रणनीति की तारीफ करते हुए उठाया सवाल

शिवसेना ने सामना के संपादकीय के जरिए बीजीपी को आड़े हाथ लेते हुए 5 राज्यो में हुए चुनावो के बारे में अपनी प्रतिक्रिया रखते हुए बताया कि किस तरह की रणनीति के साथ बीजीपी काम करती है क्या कहा इस पूरे संपादकीय में पढ़े इस पूरी खबर में…

पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव का रस और कुछ समय तक चलता रहेगा। क्योंकि मोदी के शासन में उत्सव जल्द खत्म नहीं किए जाते। पांच राज्यों का परिणाम मतलब २०२४ की लोकसभा चुनावों का रास्ता होने की बात प्रधानमंत्री मोदी ने कही है। इस पर कई प्रमुख नेताओं ने आपत्ति जताई है। चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने जीत हासिल की होगी फिर भी उसका परिणाम लोकसभा चुनावों पर नहीं होगा। देश के लिए लड़ाई २०२४ में ही होगी और उसी समय वह लड़ी जाएगी। किसी भी राज्य की लड़ाई पूरे देश का भविष्य तय नहीं कर सकती है। ऐसा राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत भूषण ने कहा है, जो कि सही ही है। विपक्ष में दमदार नेतृत्व नहीं है, इसका लाभ भाजपा को मिल रहा है। यही उनकी जीत का राज है। २०२४ तक ऐसा कोई सर्वमान्य नेतृत्व लोगों ने तैयार कर लिया तो भाजपा के पसीने छूटे बगैर नहीं रहेंगे। पंजाब के मतदान पर प्रभाव पड़े व भाजपा को लाभ हो, इसके लिए हत्या, बलात्कार, लूट-मार ऐसे आरोपों वाले बाबा राम रहीम को चुनावी मौसम के मुहूर्त पर खास पैरोल पर रिहा किया गया फिर भी पंजाब में हाथ कुछ नहीं लगा। विधानसभा चुनाव के परिणाम आते ही हिजाब का राष्ट्रीय बनाया गया मुद्दा भी खत्म कर दिया गया। दाऊद, पाकिस्तान व आतंकवाद आदि मुद्दे अब अर्थहीन हो जाने से २०२४ के लोकसभा चुनाव से पहले ये सभी मुद्दे जीवित किए जाएंगे। इसीलिए लोगों ने हमें विकास के मुद्दे पर मतदान दिया। ऐसी झूठी कहानियों का कोई अर्थ नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व का फिलहाल तो कोई तोड़ व जोड़ नहीं है, यह सत्य है। मोदी-शाह व उनका पूरा झुंड चुनाव के मैदान में एकदम निरंकुश ढंग से उतरता है। वैसा चुनावी युद्ध कौशल वर्तमान दौर में क्वचित ही दिखाई देता है। भारतीय जनता पार्टी राजनीति में अथवा चुनाव के मैदान में उतरती है तो जीतने के लिए अथवा विरोधियों को परास्त करने के लिए नहीं। उनका मकसद होता है राजनीतिक • विरोधियों को पूरी तरह खत्म अथवा बर्बाद करना। यह नीति संसदीय लोकतंत्र के लिए बेहद घातक है। स्थ्य के नजरिए से पस्त लालू यादव ऐन चुनाव के मौके में भेजा जाता है और उसी समय सर्वगुण संपन्न बाबा राम रहीम जेल से जेड प्लस सुरक्षा व्यवस्था के साथ बाहर निकाले जाते हैं। इस पर कोई भी मीडिया सरकार से सवाल नहीं पूछ सकता है। ऐसा सवाल किसी ने पूछा भी तो उसे देशद्रोही अथवा दाऊद का साथी ठहराया जाएगा, यह तय है। उत्तर प्रदेश चुनाव में बसपा की पराजय हुई इसका ठीकरा मायावती ने मीडिया पर फोड़ा। मीडिया द्वारा बसपा को भाजपा की ही बी टीम ठहराए जाने से बसपा का पारंपरिक वोटर समाजवादी पार्टी की तरफ घूम गया तो समाजवादी पार्टी के सत्ता में आने से राज्य में जंगल राज निर्माण होगा, इस डर से बसपा के अन्य मतदाताओं ने भाजपा की ओर मत घुमा दिया। मायावती ने ये महान विचार उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत होने पर व्यक्त किया है। चुनावी मैदान में वे थी ही नहीं समाजवादी पार्टी की बजाय भाजपा अच्छी वे समाजवादी पार्टी की सरकार उत्तर प्रदेश में आने नहीं देंगे। अपने इस बयान से मायावती ने अपने ‘वोटबैंक’ को एक तरह से संदेश ही दे दिया था। ओवैसी के मामले में यही हुआ। भारतीय जनता पार्टी इस तरह से चुनावी रणनीति तय कर लेती है और उसके अनुसार वे आगे बढ़ते हैं। उनकी पार्टी का चुनाव जीतने का यह राजनीतिक प्रबंधन अच्छा है, फिर भी लोकतंत्र, सामाजिक ढांचे को बर्बाद करनेवाला है। ईडी के संयुक्त निदेशक राजेश्वर सिंह अचानक में ऐच्छिक सेवानिवृत्ति लेते हैं और भारतीय जनता पार्टी की टिकट पर लखनऊ से निर्वाचित होते हैं। पद पर रहने के दौरान इसी अधिकारी ने अगस्ता वेस्टलैंड से टूजी स्पैक्ट्रम घोटाला, कोयला खान वितरण घोटाला, एयरसेल-मैक्सिस प्रकरण तक कई घोटालों की जांच की है और इन घोटालों को लेकर भाजपा ने कांग्रेस सहित अन्य विरोधियों पर छीटे उछाले हैं मतलब ‘ईडी’ जैसी संवेदनशील सरकारी सेवा में रहने के दौरान ये अधिकारी सत्ताधारी पार्टी का हुक्म मानते थे क्या? ऐसा सवाल खड़ा होता है। शिक्षित लोगों को राजनीति में आना ही चाहिए। इससे पहले कई नौकरशाह राजनीति में आकर उच्च पदों पर आसीन हो चुके हैं। इसलिए भाजपा में जाकर कोई चुनाव लड़े यह गुनाह नहीं है। सवाल इतना ही है कि केंद्रीय जांच एजेंसियों में एक दलीय राजनीति घुस गई है। जांच एजेंसियों के लोगों का राजनीतिक प्यादे के रूप में इस्तेमाल होने लगा तो देश की न्याय व्यवस्था, प्रशासन ये दोनों प्रमुख स्तंभ धराशायी हो जाएंगे। लोकतंत्र के ये प्रमुख दो स्तंभ राजनीतिक प्यादे अथवा पिहू के रूप में इस्तेमाल किए जाने लगे तो चुनाव लड़ने का कोई अर्थ ही नहीं रह जाएगा। अब तो चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर भी लोगों के मन में शंका निर्माण होने लगी है। कुछ सरकारी संस्था तो सत्ताधारियों के सामने रेंगती अथवा दौड़ती हैं इतनी भयंकर अवस्था आपातकाल के दौरान भी थी। सरकारी संपत्तियों की सीधे-सीधे विक्री हो रही है और उन्हीं पैसों के दम पर राजनीतिक उत्सव मनाए जा रहे हैं। उसी दौरान मेहनतकशों के प्रोविडेट फंड पर ब्याज दर कम करके सरकार ने बड़ा आघात किया है। यूक्रेन रूस युद्ध के रूप में महंगाई का भस्मासूर हाहाकार मचा रहा है। परंतु देश में राजनीतिक विजयोत्सव के समक्ष यह भस्मासुर किसी को दिख नहीं रहा है क्योंकि देश के शासकों की जय जयकार हो रही है। इस जय-जयकार से सवालों का कोलाहल कुछ समय सुनाई नहीं देगा परंतु बेरोजगारी से महगाई तक समस्या तो बरकरार रहेगी ही चार राज्यों में विकास के मुद्दे पर जीत मिली, ऐसा वे कितना भी कहें फिर भी यह सत्य नहीं लगेगा। मतों का ध्रुवीकरण, असीमित धूल झोंकना और अन्य बहुत कुछ हाथ में होने से ही भाजपा को जीत मिली। श्रीमान ओवैसी उत्तर प्रदेश में खास रूप से अवतरित हुए तो क्या मुसलमानों का वोट लेने के लिए? ओवैसी को प्रायोजित किया गया तो हिंदू मत का ध्रुवीकरण करने के लिए हिंदुओं को भड़काने के लिए, उसमें सफलता मिल गई। परंतु अब यह और कितने समय तक चलेगा? देश में यह इसी तरह चलता रहेगा क्या? चिंतन किया जाए, ऐसा माहौल है। परंतु विचार करने की क्षमता को खत्म कर दिया गया है। जीत इसी से मिली है।

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